Type Here to Get Search Results !

मूल संरचना सिद्धांत - Basic Structure Doctrine

सुप्रीम कोर्ट के जजमेंट के अनुसार मूल संरचना सिद्धांत (Basic Structure Doctrine) संविधान का एक ऐसा भाग है जिसके साथ संसद किसी भी रूप से छेड़छाड़ नहीं कर सकता। मूल संरचना सिद्धांत संविधान एक अंत्यंत महत्वपूर्ण निर्णय था जो सुप्रीम कोर्ट ने केश्वानंदा भारती केस के दौरान दिया था। 

सुप्रीम कोर्ट ने कहा संविधान के किसी भी भाग में बदलाव, संविधान के मूल विशेषता को ध्यान में रख कर किया जायेगा। मूल संरचना सिद्धांत (Basic Structure Doctrine) को समझने के लिए आपको कुछ मामलों और संशोधन को जानना आवश्यक है।

तो चलिए एक उदाहरण लेते हैं मान लीजिए अगर मैं आपको एक कपड़ा दूं और साथ में एक कैंची भी दूं जिससे आप इस कपड़े को काटकर कुछ बेहतर बना सकें लेकिन क्या आप कैंची का उपयोग करके इस कपड़े को फाड़ कर फेंक सकते हैं? 

बस इसी पर आधारित हम मूल संरचना सिद्धांत (Basic Structure Doctrine) को इस आर्टिकल की मदद से आपको बताने जा रहे हैं। तो यह जो कपड़ा है यह हमारा संविधान है और यह कैंची इस संविधान में बदलाव करने की जो ताकत है जो संसद के पास है। तो इस पोस्ट के माध्यम से हम आपको दो महत्वपूर्ण प्रश्नों के उत्तर को समझेंगे –


पहला प्रश्न क्या पार्लियामेंट नागरिकों के मौलिक अधिकार में संशोधन कर सकती है ?

दूसरा प्रश्न – किस हद तक पार्लियामेंट भारतीय कानून में संशोधन कर सकती है ?


अगर आप सोच रहे होंगे कि यह प्रश्न क्यों उठा तो आपको बता दें इस प्रश्न के गाने उठाने का कारण आर्टिकल 13 और आर्टिकल 368 था। लेकिन दोनों आर्टिकल पर उठे विवाद को समझने के लिए सबसे पहले यह जान लीजिए की किसी भी संविधान को समय-समय पर बदलने की जरूरत होती है।

क्योंकि जब 1950 में हमारा संविधान आया था तो उस समय के सामाजिक, आर्थिक, शिक्षा, वित्तीय स्थिति आदि चीजों को ध्यान में रखकर बनाया गया था। लेकिन समय-समय पर इसमें बदलाव होना आवश्यक है।

आर्टिकल 13 और आर्टिकल 368 क्या थे ?

सबसे पहले आर्टिकल 13 जो यह कहता है कि हमारा संसद कोई ऐसा कानून नहीं बना सकता जिससे नागरिकों के मौलिक अधिकार का हनन हो या उनमें कोई कमी आए।

वहीं दूसरी तरफ आर्टिकल 368 में पार्लियामेंट के पास पूरा अधिकार है की पार्लियामेंट, भारतीय संविधान के किसी भी भाग में परिवर्तन कर सकती है उनमें संशोधन कर सकती है।

बस इसी से यह प्रश्न उठता है कि क्या पार्लिमेंट आर्टिकल 368 की शक्तियों को इस्तेमाल करते हुए क्या आर्टिकल 13 में परिवर्तन ला सकता है या फिर आर्टिकल 13 पार्लियामेंट 368 इस्तेमाल करने से रोकता है ?

यह प्रश्न कितना महत्वपूर्ण है आप इस बात से समझ सकते हैं कि जब जब 1st, 17th, 24th, 39th और 42nd संशोधन कानून में इस प्रश्न को पूछा गया और इस प्रश्न का उत्तर सुप्रीम कोर्ट के जजों ने कई सारे महत्वपूर्ण मामलों के अंतर्गत दिए हैं जो है –

  • शंकरी प्रसाद केस
  • सज्जन सिंह केस
  • गोलकनाथ केस
  • केशवानंद भारती केस
  • इंदिरा गांधी केस
  • मिनर्वा मिल्स केस

इस प्रश्न के उत्तर को समझने के लिए आपको कुछ महत्वपूर्ण संवैधानिक संशोधन अधिनियम को समझना होगा। तो चलिए देखते है इन संशोधन अधिनियम को –

पहला संशोधन अधिनियम, 1951 (1st Amendment Act, 1951)

जब 1950 में हमारा संविधान लागू हुआ था तब भारतीय नागरिकों को 7 मौलिक अधिकार दिए गए थे जिसमें एक था संपत्ति का अधिकार जो कि आर्टिकल 31 के अंतर्गत आता है इसे 44वां संशोधन अधिनियम से इसे हटा दिया गया था।

जब भारत आजाद हुआ था तब भू – स्वामित्व में काफी असमनता थी। भारत सरकार जमींदारी सिस्टम को हटाना चाहती थी और इसके लिए कांग्रेस पार्टी कृषि सुधार समिति (Agrarian Reform Committee) का गठन करती है जिसके चेयरमैन JC. Kumarappa थे। 

इस कमेटी ने लैंड होल्डिंग ओनरशिप को सीमित कर दिया। मतलब किसी भी व्यक्ति के पास और असीमित जमीन नहीं हो सकती। इसी को लेकर 1951 में पहला संशोधन अधिनियम पारित किया गया जिसके तहत आर्टिकल 31(A) आर्टिकल 31(B) और 9वीं अनुसूची (9th Scheduled) को लाया गया।

तो हमें पहला संशोधन अधिनियम से दो बदलाव देखने को मिला पहला आर्टिकल 31 में दो चीजें नहीं जुड़ गई थी। जिसके अनुसार यह कहा गया कि राज्य सरकार के पास ताकत है कि वह किसी भी नागरिक के प्राइवेट प्रॉपर्टी को ले सकती है और बदले में उसे छतिपूर्ति दे दी जाएगी।

अब साथ में आर्टिकल 19(i)(g) में भी कुछ बदलाव लाए गए थे जिनके तहत राज्य राज्य सरकारों को यह शक्ति दी गई थी कि वह किसी भी बिजनेस को पूरी तरह से या किसी विभाग को अपने अंतरगर्त ले सकते हैं।

शंकरी प्रसाद बनाम भारत संघ (Shankari Prasad v. Union of India)

अगर आपने ध्यान से देखा होगा तो आपको पता चलेगा कि पहले संशोधन कानून मैं नागरिकों के मौलिक अधिकार की उल्लंघन की जा रही थी या नागरिकों के मौलिक अधिकार को कम किया जा रहा था। जिसके लिए पहला संशोधन अधिनियम को शंकरी प्रसाद बनाम भारत संघ के केस में चैलेंज किया गया। 

इस केस के जजमेंट में सुप्रीम कोर्ट ने कहा पहला संशोधन कानून में जो बदलाव किए गए हैं वह बिल्कुल सही है और आर्टिकल 368 के अनुसार पार्लियामेंट के पास यह ताकत है की वो नागरिकों के मौलिक अधिकार में बदलाव कर सकती है।

साथ में सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि आर्टिकल 13 सिर्फ साधारण कानून पर ही लगेगा और 368 कोई साधारण कानून नहीं है, इसीलिए संसद के पास यह पावर है कि वह मौलिक अधिकार में संशोधन कर सकती है अंतः इस केस में आर्टिकल 368 को जयादा शक्तिशाली माना गया।

17 वां संशोधन अधिनियम (17th Amendment Act)

इसके बाद 17वां संशोधन अधिनियम आया जिसमें राज्य के भूमि सुधार अधिनियम को 9वीं अनुसूचित में डाल दिया था। जिससे यह क़ानून अवश्य ही लागू होगा और फिर इसका न्यायिक समीक्षा भी नहीं होगा। और इसीलिए इस संशोधन कानून को सज्जन सिंह बनाम स्टेट ऑफ राजस्थान के केस में चैलेंज किया गया था।

सज्जन सिंह बनाम राजस्थान राज्य (Sajjan Singh vs. State of Rajasthan)

इस केस के जजमेंट शंकरी प्रसाद के केस के जजमेंट के तरह ही था। इस केस में भी आर्टिकल 368 को ज्यादा महत्व देते हुए यह कहा गया कि पार्लियामेंट मौलिक अधिकारों को बदल सकते हैं। इस केस की जजमेंट के लिए पांच जजों की बेंच निर्धारित की गई थी जिसमें 3:2 से इसका जजमेंट आया था। 

इस केस के मुख्य न्यायमूर्ति CJ Gajendragadkar थे, जिन्होंने कहा था की आर्टिकल 13, संवैधानिक संशोधन पर लागू नहीं होगा। साथ में यह भी कहा कि अगर संविधान बनाते समय संविधान निर्माता को मौलिक अधिकार में बदलाव से बचाना ही होता तो कोई अलग कानून जरूर ही लिखा होता लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं लिखा हुआ। 

इसीलिए हम यह मान लेंगे की नागरिकों के मौलिक अधिकार में बदलाव किया जा सकता है और इसके लिए आर्टिकल 368 के अनुसार पार्लियामेंट को यह शक्ति है कि वह मौलिक अधिकारों में परिवर्तन कर सकती है।

लेकिन CJ Gajendragadkar के इस फैसले से justice J. Hidaytullaa और Justice J. Mudholkar खुश नहीं थे इसीलिए उन्होंने इस केस को एक बड़ी बेंच को सौंप (Refer) कर दिया। इसके बाद यह केस एक 11 जजों की बेंच के पास गई जो था गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य का केस।

गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य (Golaknath v. State of Punjab)

इस केस में सुप्रीम कोर्ट ने बहुत ही महत्वपूर्ण फैसला सुनाया 11 जजों की बेंच ने कहा कि पार्लियामेंट अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए नागरिकों के मौलिक अधिकार में बदलाव नहीं कर सकती साथ ही आर्टिकल 13, संवैधानिक संशोधन पर भी लागू होगा। जैसे ही जजमेंट आया वैसे ही जजमेंट के आधार पर इससे पहले के जो भी पारित संशोधन कानून थे।

24वां संशोधन अधिनियम (24th Amendment Act)

सुप्रीम कोर्ट के इस जजमेंट ने पार्लियामेंट की शक्तियों पर काफी पाबंदी लगा दी थी। अब पार्लियामेंट में अपनी शक्ति को वापिस लाने के लिए 24 वा संशोधन कानून पारित करती है।

इस संशोधन कानून के अनुसार पार्लियामेंट आर्टिकल 13 और आर्टिकल 368 जो इन सब का जड़ है, यह संशोधन कानून उन्हें ही बदल देती है। आर्टिकल 13 में (d4) और आर्टिकल 368 में (B3) जोड़ती है। इन दोनों आर्टिकल के साथ और भी कई बदलाव किए जाते हैं लेकिन जो मुख्य है वह यही दोनों है। 

इन बदलावों में यह कहा गया कि अगर पार्लियामेंट कोई संशोधन कानून लाती है तो यह आर्टिकल 13 के अंतर्गत नहीं आएगा और आर्टिकल 13, आर्टिकल 368 पर लागू नहीं होगा तो इससे हमें यह पता चला कि पार्लियामेंट जो रूट कॉज था यह उसमें ही परिवर्तन ला देती है।

24 वे संशोधन कानून में यह भी कहा गया कि अगर पार्लियामेंट चाहे तो संविधान के किसी भी भाग में बदलाव कर सकती है मौलिक अधिकार में भी। तो इससे हमें यह पता चला कि पार्लियामेंट ने अपनी शक्ति को वापस लाने जो इस समस्या के जड़ को ही ख़तम कर देती है।

इसके बाद संसद कुछ और भी महत्वपूर्ण संशोधन कानून लाती है जिनमें 25 वा संशोधन कानून जिसने प्रॉपर्टी राइट को कम कर दिया, 26 वा संशोधन कानून जिसने Privy Purse को खत्म कर दिया, और 29 वा संशोधन कानून जो लैंड रिफॉर्म्स एक्ट लेकर आया।

केशवानंद भारती का केस - Basic Structure Doctrine

इस केस में सुप्रीम कोर्ट की सबसे बड़ी बेंच जोकि 13 जजों की बेंच ने लगाई गई थी। इस केस को मौलिक अधिकार मामला भी कहा जाता है।

इस केस में 24 वा, 25 वा, 26 वा, और 29 वा संशोधन कानून के साथ-साथ गोलकनाथ केस को भी चैलेंज किया गया था। सुप्रीम कोर्ट के पास एक बार फिर से वही प्रश्न सामने आया पार्लियामेंट के पास किसी भी कानून में बदलाव करने की सीमा कितनी है। क्या पामेंट पार्लियामेंट पूरे संविधान को ही बदल सकता है या मौलिक अधिकार को ही बदल कर खत्म कर सकता है ?

यह प्रश्न एक बार फिर से सुप्रीम कोर्ट के सामने था। इन प्रश्नों के उत्तर में सुप्रीम कोर्ट ने कहा की हां पार्लियामेंट के पास संविधान में संशोधन करने की असीमित शक्तियां प्रदान है और 24वा संशोधन कानून को वैद्य बताया।

लेकिन जब मौलिक अधिकारों की बात आई तो सुप्रीम कोर्ट ने इसका उत्तर पिछले जजमेंट्स की तरह ना देकर एक अलग ही उतर दिया और कहा पार्लियामेंट कभी भी संविधान के या मौलिक अधिकार के बुनियादी संरचना में बदलाव नहीं कर सकती और मूल संरचना का सिद्धांत (Basic Structure Doctrine) लागू किया।

39वां संशोधन अधिनियम (39th Amendment Act)

12 जून 1975 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ऐतिहासिक जजमेंट दिया। इसमें इलाहाबाद हाईकोर्ट ने चुनावी कदाचार (Electoral Malpractice) के कारण इंदिरा गांधी के इलेक्शन को को खारिज (Quashed) कर दिया। इसके साथ ही इंदिरा गांधी को 6 साल के लिए किसी भी चुनाव कार्यालय को होल्ड करने से वंचित कर दिया जाता है।

इलाहाबाद हाई कोर्ट के जजमेंट से इंदिरा गांधी काफी असंतुष्ट होती हैं और इसके बाद इंदिरा गांधी सुप्रीम कोर्ट में फिर से अपील करती हैं लेकिन अपील से 1 दिन पूर्व 39th संशोधन अधिनियम पारित करती हैं साथ में उन्होंने नेशनल आपातकाल भी पूरे देश में लागू कर दी। अब संशोधन कानून ने एक नया आर्टिकल, आर्टिकल 329 (A) को लाया और पहले से मौजूद आर्टिकल 71 को हटा दिया।

प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने यह सारे बदलाव हियरिंग से ठीक 1 दिन पहले की थी, आपको यह बता देगी इंदिरा गांधी का यह केस आज भी पेंडिंग है। इंदिरा गांधी ने जो नया आर्टिकल लेकर आई थी।

 329 (A) इसके अनुसार सुप्रीम कोर्ट के पास चुनावी विवाद से जुड़े किसी भी मामले में सुनवाई करने की शक्ति नहीं होगी और यह भी कहा गया कि सुप्रीम कोर्ट राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, और लोकसभा के स्पीकर की चुनावी विवाद के मामले में कोई सुनवाई नहीं कर सकता।

इस नए संशोधन कानून को लाने का मकसद साफ-साफ दिख रहा था। इस संशोधन कानून के आने से इंदिरा गांधी अपने प्रधानमंत्री के पद पर बनी रह सकती थी क्योंकि इस संशोधन कानून के आने से इलाहाबाद हाई कोर्ट के जजमेंट की कोई कीमत नहीं रह गई थी।

इसके बाद जब लोकसभा के वोट की रिजल्ट आई तो इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री के पद से हार गई थी। और अगले प्रधानमंत्री बनते हैं मोरारजी देसाई जिन्होंने प्रधानमंत्री बनने के बाद पिछले संशोधन में जो भी गलतियां हुई थी उनको ठीक करने के लिए उन्होंने कुछ कानून पारित किया।

जिनमें उन्होंने आर्टिकल 329 (A) ही को हटा दिया और फिर से आर्टिकल 71 को ले आए जिससे सुप्रीम कोर्ट को उनकी पावर वापस मिल गई। अब सुप्रीम कोर्ट फिर से चुनावी विवाद के मामले को देख सकते थे।

42वां संशोधन अधिनियम (42nd Amendment Act)

42वा संशोधन कानून ने इतने सारे बदलाव किए कि इसे भारत का लघु संविधान भी कहा जाता है। लेकिन हम दो ही बदलाव के बारे में बात करेंगे जिनमें पहला है आर्टिकल 31(C) में Section 4 को नया जोड़ा गया और आर्टिकल 368 में Clause 4 और 5 जोड़ा गया था।

आर्टिकल 31c के सेक्शन 4 के अनुसार पार्लियामेंट संविधान के पार्ट 3 और पार्ट 4 में कोई भी बदलाव कर सकता है। आपको यह बता दें कि पार्ट 3 नागरिकों के मूल अधिकार की बात करता है और पार्ट 4 राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांत की बात करता है। 

पार्लियामेंट इस नए सेक्शन को जोड़कर संविधान को बदलने के साथ मौलिक अधिकारों में भी बदलाव करने की ताकत वापस ले ली थी। साथ ही पार्लियामेंट पार्ट 3 में कोई भी बदलाव करती है तो इसे कोर्ट में चैलेंज भी नहीं किया जा सकता। 

साथ में पार्लियामेंट की संशोधन करने की शक्तियों में कोई भी लिमिट नहीं है अब पार्लियामेंट के पास पूरी छुट्टी की पार्लियामेंट संविधान के किसी भी भाग में कोई भी बदलाव करने की।

इन सारे बदलाव का कारण था कि केसवानंदा भारती के केस में जो भी जजमेंट आया था उसमे सुप्रीम कोर्ट ने एक नया डॉक्ट्रिन जिसे मूल संरचना सिद्धांत (Basic Structure Doctrine) कहते है, लाया गया था जिससे पार्लियामेंट संविधान के मूल संरचना को नहीं बदल सकते थे। अपनी इसी खोई हुई शक्ति को वापस पाने के लिए संसद ने यह 42वां संशोधन कानून पारित किया।

मिनर्वा मिल्स केस (Minerva Mills Case)

अब 42 वें संशोधन कानून को मिनर्वा मिल केस में चैलेंज किया गया था। इस केस में जो भी याचिकाकर्ता थे वह मुंबई के मशहूर मिनर्वा मिल्स के मालिक थे। इस मिल को सरकार राष्ट्रीयकरण के कारण ले लेती है। 

जब सुप्रीम कोर्ट ने इस केस की सुनवाई की तो परिणाम स्वरूप 42 वें संशोधन कानून को सुप्रीम कोर्ट ने अमान्य कहां और हमें सविधान के तीन नए मूल संरचना सिद्धांत दिए –

न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) – सुप्रीम कोर्ट ने कहा जुडिशल रिव्यु संविधान का एक बेसिक फीचर है पार्लियामेंट अपने संशोधन की शक्ति का प्रयोग करके इसे हटा नहीं सकता या बदल नहीं सकता।

सीमित संशोधन शक्तियां (Limited Amending Powers) – पार्लियामेंट के पास एक लिमिटेड पावर है जिसका इस्तेमाल करके पार्लियामेंट अपनी शक्तियों को नहीं बढ़ा सकता या अनलिमिटेड नहीं कर सकता। इसका अर्थ है पार्लियामेंट के पास लिमिटेड पावर है जो की संविधान का एक मूल संरचना है।

सद्भाव (Harmony) सुप्रीम कोर्ट ने कहा की सविधान के Part 3 और Part 4 में सद्भाव (Harmony) बनी रहनी चाहिए। इसका मतलब मौलिक अधिकार और डायरेक्टिव प्रिंसिपल को समान रूप से होना चाहिए ना कि एक दूसरे के विरोधी हो, इसीलिए Harmony भी संविधान का एक मूल संरचना है।

वामन राव बनाम भारत संघ (Waman Rao vs. Union of India)

केसवानंदा भारती केस के बाद जब सुप्रीम कोर्ट ने मूल संरचना सिद्धांत (Basic Structure Doctrine) को लागू किया उसके बाद जितने भी संशोधित कानून थे वह सभी कोर्ट में एक के बाद एक चैलेंज होने लगे थे। 

जज ने इस केस के जजमेंट में कहा की केसवानंदा भारती का जजमेंट 24 अप्रैल 1973 को आया था और इससे पहले के जो भी संशोधित कानून है उनमें कोई भी बदलाव नहीं होगा और यह जजमेंट 24 अप्रैल 1973 के बाद से ही लागू होगा।

निष्कर्ष

तो दोस्तों यह था सुप्रीम कोर्ट का मूल संरचना सिद्धांत (Basic Structure Doctrine) इसमें आपने देखा कि किस तरह से सुप्रीम कोर्ट के सामने बार-बार एक ही प्रश्न आ रहे थे और अंत में किस तरह से सुप्रीम कोर्ट ने केशवानंद भारती के केस में मूल संरचना सिद्धांत को लाकर पार्लियामेंट के संविधान बदलने की शक्तियों पर एक नया संकल्पना ला दिया। 

पार्लियामेंट ने कई प्रयास किए जिससे उनके पास संविधान को संशोधन करने की जो और असीमित सकती है वह बरकरार रहे लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें संविधान में संशोधन करने की असीमित शक्तियां देते हुए भी कुछ मूल संरचना सिद्धांत भी दिए जिनमें पार्लियामेंट बदलाव नहीं कर सकती।

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ
* Please Don't Spam Here. All the Comments are Reviewed by Admin.