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केशवानन्द भारती का केस - Keshwananda Bharti Case in Hindi

केशवानन्द भारती का केस (Keshwananda Bharti Case in Hindi) भारत में सबसे महत्वपूर्ण मामलो में से एक है। अगर आप किसी लॉ कॉलेज के विद्यार्थी हैं तो आपको इस केस के बारे में जरूर ही जानकारी होनी चाहिए। 

यह केस अपने आप में ही बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि इस केस में सुप्रीम कोर्ट ने कुछ ऐसे जजमेंट दिए हैं जो अपने आप में एक बहुत ही बड़ी बात है।

सुप्रीम कोर्ट में यह केस सबसे लंबा चलने वाला केस था जो 68 दिन तक चला था। दोस्तों इस केस के लिए 100 से ज्यादा मामलो को साइड कर दिया गया था। 

यही नहीं इस केस को समझने के लिए 70 से ज्यादा देशो के सविधान से तुलना भी किया गया था।  का यह केस का जजमेंट आया तो यह कुल 703 पन्नो का था। अंत में कहे तो केशवानन्द भारती का केस भारत के महत्वपूर्ण मामलो में से एक था।

केशवानन्द भारती का केस - Keshwananda Bharti Case in Hindi

केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य का केस

भारत को आजादी मिलने के बाद भारत के सभी राज्य अपने अपने क्षेत्र के सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था को ठीक करने में लग जाते हैं। 

जब 1950 में भारतीय संविधान लागू हो गया उसके बाद नागरिकों को पता चला कि समानता (Equality) उनका एक मौलिक अधिकार (Fundamental Right) है।

उस समय संसाधन और उत्पादन के साधन कुछ चुनिंदा लोगों के ही पास था और राज्य सरकार को धीरे-धीरे यह समझ आने लगा की धन की एकाग्रता सही नहीं है। इसी चीज को बदलने के लिए भारत के सभी राज्य अपने अपने कानूनों में बदलाव कर रहे थे।

ऐसा ही कुछ किया केरला के राज्य सरकार ने, केरला के मुख्यमंत्री ने सामाजिक और आर्थिक हालात को ठीक करने के लिए केरला भूमि सुधार अधिनियम, 1963 पारित किया। यह भूमि सुधार अधिनियम सम्पति का अधिकार पर रोक लगता था।

केरला का मुख्यमंत्री ने इस कानून का इस्तेमाल करके केरला के का कासरगोड जिले के एडनीर मठ का जमीन पर अपना अधिकार कर लिया। जिसके कारण मठ की इनकम खत्म हो जाती है। 

मठ का अपने कामकाज संभालने में दिक्कत होने लगती है। यही कारण था की एडनीर मठ प्रमुख श्री केशवानंद भारती ने इस भूमि सुधार अधिनियम को कोर्ट में चैलेंज कर दिया।

केशवानन्द भारती का केस को सुप्रीम कोर्ट में बोहोत ही मशहूर वकील नाना भाई पाल के रिप्रेजेंट करते हैं। जैसा की आपको पता है यह लैंड रिफॉर्म एक्ट नागरिको के मौलिक अधिकार में से एक संपत्ति का अधिकार पर प्रतिबंध लगाते थे। 

इसीलिए केसवानंद भारती ने मार्च 1970 में इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में एक रिट (Writ) लगाया और कहां यह भूमि सुधार अधिनियम मेरे मौलिक अधिकार आर्टिकल 14, आर्टिकल 19(f), आर्टिकल 25 और आर्टिकल 26 का उल्लंघन करते हैं। 

उन्होंने यह भी कहा कि किसी भी जमीन का स्वामी होना किसी भी नागरिक का मौलिक अधिकार है। उस समय सुप्रीम कोर्ट में अन्य महत्वपूर्ण के केस चल रहे थे जैसे बैंक नेशनलाइजेशन केस 1970, माधव राव सिंधिया केस 1971, गोलकनाथ केस 1967 आदि।

आपने अगर गौर किया होगा तो आपको पता चलेगा कि इन सारे केस में ही भारत की दो महत्वपूर्ण शक्तियां लड़ रही थी जिनमें पहली पार्लियामेंट और दूसरी हमारी न्यायपालिका। 

पार्लियामेंट का कहना था कि भारतीय संविधान की आर्टिकल 368 के अनुसार हमारे पास किसी भी कानून में बदलाव करने की असीमित शक्तियां हैं, लेकिन सुप्रीम कोर्ट इस बात से बिलकुल सहमत नहीं थी।

इसीलिए सुप्रीम कोर्ट के पास जब गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य का केस आया तो सुप्रीम कोर्ट के सामने एक महत्वपूर्ण प्रश्न भी आया की क्या संसद के पास किसी भी कानून में बदलाव करने की असीमित शक्तियां है? 

तो सुप्रीम कोर्ट ने बहुत अच्छी तरीके से इस बात का जवाब दिया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संसद के पास किसी भी कानून में मनमानी बदलाव करने की असीमित शक्तियां नहीं है। 

इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने जब संसद के ऊपर पाबंदी लगाया तो संसद ने अपने ऊपर से पाबंदी को हटाने के लिए 24th, 25th, और 29th संशोधन कानून लाया जिससे पार्लियामेंट को उसकी शक्तियां वापस मिल सके।

24वां, 25वां और 29वां संशोधन

ये संशोधन कानून काफी महत्वपूर्ण थे। तो चलिए देखते हैं ये संसोधन क़ानून क्या थे –

24 वें संशोधन कानून के अनुसार, पार्लियामेंट को यह शक्ति प्रदान है कि वह नागरिकों के मौलिक अधिकारों में परिवर्तन ला सकती है। साथ में संसद को यह भी अधिकार है कि वह किसी भी कानून में परिवर्तन कर सकता है।

25 वा संशोधन कानून के अनुसार, संपत्ति का अधिकार पर रोग लगाई जा सकती है। यही नहीं सरकार जनता के इस्तेमाल के लिए किसी भी प्राइवेट प्रॉपर्टी को ले कर सकती है और इसके लिए उन्हें जो भी नुक्सान भरपाई देना होगा वह पार्लियामेंट तय करेगा ना कि कोर्ट।

29 वा संशोधन कानून के अनुसार, भूमि सुधार अधिनियम को 9वीं अनुसूची में डाल दिया गया। 9वीं अनुसूची में जब कोई कानून जाता है तो इसका मतलब यह होता है कि उस कानून पर कोई भी प्रश्न नहीं उठाया जा सकता और कोर्ट में उन कानूनों का रिव्यु नहीं हो सकता

अब भूमि सुधार अधिनियम को 9वीं अनुसूची में जाने के बाद मुक्ति मिल गई किसी भी प्रश्न से। इसीलिए केशवानन्द भारती का केस (Keshwananda Bharti Case in Hindi) में भूमि सुधार अधिनियम के साथ-साथ इन तीन संशोधन कानूनों पर भी प्रश्न उठाए गए थे और उन्हें कोर्ट में चैलेंज किया गया था।

वैसे तो इस केस में बहुत सारे प्रश्न उठाए गए थे लेकिन जो मुख्य प्रश्न था वह यह था कि –

Que 01. क्या संसद को यह शक्ति प्राप्त है कि वह मौलिक अधिकारों में परिवर्तन कर सकती है?

Que 02. और अगर इस प्रश्न का उत्तर हां है तो संसद किस हद तक मौलिक अधिकारों में परिवर्तन कर सकती है?

याचिकाकर्ता की दलीलें (Petitioner’s Arguments)

याचिकाकर्ता का कहना था कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 368 के अनुसार संसद को जो शक्तियां मिली हुई है, वह कोई असीमित शक्तियां नहीं है बल्कि इसके विपरीत संसद के पास एक सीमित शक्ति है। जिसके अनुसार पार्लियामेंट किसी भी कानून को अपने मर्जी के मुताबिक संशोधित नहीं कर सकता है।

दूसरा, याचिकाकर्ताओं का कहना यह था कि 24 वा और 25 वा संशोधन कानून जिससे आर्टिकल 31(c) को लाया गया था यह नागरिकों के मौलिक अधिकार पर प्रतिबन्ध लगाता है जोकि एक गलत कानून है।

प्रतिवादी की दलीले (Decedent’s Arguments)

अब प्रतिवादी पक्छ का कहना यह था कि पार्लियामेंट को किसी भी कानून में संशोधन करने की असीमित शक्तियां प्रदान है साथ में राज्य को अपनी सामाजिक और आर्थिक स्थिति में सुधार करनी होती है। 

इसीलिए संसद की शक्तियों पर बाध्यता नहीं लगाई जानी चाहिए क्योंकि अगर पार्लियामेंट की शक्तियों को बाध्यता किया गया तो पार्लिमेंट बदलते समय के अनुसार कानून में परिवर्तन नहीं ला सकेगी। 

पार्लियामेंट के पास कुछ मौलिक अधिकार पर रिस्ट्रिक्शन लगाने की शक्ति होती है जैसे – भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, संघ बनाने का अधिकार, धार्मिक की स्वतंत्रता आदि।

निर्णय (Judgement)

इस केस में अब तक की सबसे लंबी जज की बेंच बैठी थी जो कि 13 जजों की थी। इस केस का जजमेंट 7:6 के बहुमत से आया था जो की 713 पन्नो का था। 

सुप्रीम कोर्ट ने इस केस से पहले वाले केस जिसका नाम गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य के केस में कहा था की संसद नागरिकों के मौलिक अधिकारों में परिवर्तन नहीं कर सकती।

अब सुप्रीम कोर्ट ने इस केस में इस चीज को बदल दिया या कहे तो जजमेंट को ख़ारिज कर दिया और कहा संसद नागरिकों के मौलिक अधिकारों में परिवर्तन कर सकती है साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा की संसद का जो 24 वा संशोधन कानून है वह वैद्य (Valid) है। 

इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि अनुच्छेद 368 के अनुसार, पार्लियामेंट के पास पूरी पावर है कि वह संविधान के किसी भी कानून में संशोधन कर सकती है।

इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने दूसरे प्रश्न का उत्तर दिया जो था पार्लियामेंट के पास जो जो शक्तियां हैं उसकी सीमा क्या है? सुप्रीम कोर्ट ने कहा भले ही पार्लियामेंट के पास किसी भी कानून में बदलाव करने की असीमित शक्तियां है। 

लेकिन पार्लियामेंट कानून में संशोधन करने की शक्ति को इस प्रकार से इस्तेमाल करेगी जिससे संविधान के जो मूल विशेषता (Basic Features) है उनमे कोई भी हस्तक्षेप ना हो और इसी समय सुप्रीम कोर्ट ने एक नया सिद्धांत का आरम्भ किया जिसका नाम था “मूल संरचना सिद्धांत” (Basic Structure Doctrine.)

साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने 25 वा और 29 वा संशोधन कानून को भी वैद्य बताया और कहा अगर कोई कानून ऐसा है जिसे 9वीं अनुसूची में डाला गया है और वह मूल संरचना सिद्धांत (Basic Structure Doctrine) का उलघन करता है तो ऐसे कानून का न्यायिक समीक्षा हो सकता है।

निष्कर्ष

24 अप्रैल 1973 को सुप्रीम कोर्ट ने एक लैंड मार्क जजमेंट दीया, जिसमें मूल संरचना सिद्धांत को लाया पहली बार लाया गया। दोस्तों यह केस इसीलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इस केस में सुप्रीम कोर्ट ने अपने रचनात्मकता का इस्तेमाल करते हुए और काफी सूझबूझ से अपना जजमेंट पारित किया। साथ ही एक नया डॉक्ट्रिन को भी लाया गया जिससे सुप्रीम कोर्ट ने पार्लियामेंट को असीमित शक्तियां तो दी लेकिन संविधान के मूल विशेषता के बदलने पर रोक लगा दी।

दोस्तों सुप्रीम कोर्ट के जजमेंट ने आने वाले समय के लिए भारतीय लोकतंत्र की रक्षा किया और भारत को एक नई दिशा में मोड़ दिया। अगर आप सोच रहे होंगे की इस केस का परिणाम क्या हुआ तो इस केस में केसवानंद भारती की हार हुई थी और उन्हें अपने मठ की जमीन छोड़नी पड़ी थी। तो दोस्त यह था केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य का केस जिसे केशवानन्द भारती का केस भी कहते है जिसमें केसवानंद भारती खुद अपना ही केस हार गए थी।

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